“देव की मोरी”, शामलाजी


CONTRIBUTED BY RAHUL CHAUDHARY

शामला जी के पास १९५९ में एक उत्खनन के दौरान एक प्राचीन बौध स्तूप और कुछ मंदिरों के अवशेष मिले. उस स्थान का नाम था – “देव की मोरी” अर्थात – देवताओं का दरवाजा. बहुत ढूँढने पर पता चला की लगभग १० साल पहले निर्मित मेश्वो बाँध (मेश्वो नदी पर बना एक बड़ा जलाशय) के जलाशय में यह स्थान जल निमग्न हो गया है. वहाँ से प्राप्त वस्तुओं को शामलाजी, मोडासा ( गुजरात के साबरकांठा जिले में यह स्थान है मोडासा. यह स्थान एतिहासिक रूप से प्रसिद्ध इडर प्रान्त में आता था. और पुरातात्विक रूप से प्रसिद्ध शामला जी के नजदीक है) तथा बडौदा के संग्राहलयों में भेज दिया गया. शामला जी एवम मोडासा के संग्राहलयों में कुछ अद्भुत वस्तुएं मिलीं. किन्तु देव की मोरी के डूबने के कारन उसे न देख पाने की तीस मन में जरूर रह गयी. एक अच्छी बात है की मोडासा के संग्राहलय की देख रेख व संयोजन सरकार द्वारा नहीं बल्कि एक ट्रस्ट द्वारा किया जाता है. संग्राहलय की इस परिकल्पना को साकार रूप देवे वाली माननीय पुराणी साहब से भी मिलना हुआ. जिनके पास असाधारण पांडुलिपियों के साथ संग्रह है……

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